जे ऎन यू के छात्र नेता कन्हैया का लाल सलाम का नारा ऎसे समय में हुआ है जब कम्युनिस्ट पार्टी अपना वर्चस्व खो चुकी है। उपरोक्त तथ्य के आलोक में यदि गहराई से देखा जाये तो दो बिंदु दृष्टिगोचर हैं।
पहला कन्हैया एक छात्र नेता के रूप में जे ऐन यू में पैदा हुए हैं जो लाल सलाम का नारा लगा रहे हैं। दूसरे ये नारे ऎसे समय में लगे हैं जब लाल सलाम का नारा अपनी प्रासंगिकता खो चुका है।
कन्हैया का भाषण, छात्रों के बीच तालियों की गड़गड़ाहट , प्राइम टाइम में जगह पा जाना, गैर भाजपाई पार्टियों द्वारा सर आँखों में बिठाकर पीठ थपथपाना आदि ऐसे समय में हो रहा है जब देश में कई अहम मुद्दे मुह बाये खड़ी है। पूरे विश्व में
शायद ही कोई ऐसा देश होगा जिसमे अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर इतना कोहराम मचा होगा।
दरअसल कन्हैया की शिक्षा दीक्षा ऎसे दूषित वातावरण में हुई है जहाँ राष्ट्रवाद और अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर जहर पिलाया गया है। ये एक ओर जहाँ संविधान में आस्था की बात करते हैं वहीँ अपने देश के पूर्ण बहुमत पाये प्रधान मंत्री के लिए "तुम " की भाषा का प्रयोग करते हैं। ये तो छिछले स्तर की भाषा है।
मैं भी बिहार का ही हूँ। सौम्य भाषा का प्रयोग बिहार के निवासियों की पहचान है। हम बिहारी रिक्शा चलने वालों को भी "तुम" कहकर सम्बोधित नहीं करते।
कन्हैया का भाषण कॉलेज में भले ही तालियां बटोरता हो पर असली धरातल पर देश को कमजोर कर रहा है। एक तरफ जहाँ देश की समस्याओं की चर्चा के लिए संसद में और मीडिया का टाइम जाया हो रहा है वहीँ जनता इस अनावश्यक बहस से ऊब चुकी है। देश का कीमती समय बर्बाद हो रहा है।
कौन है जो इसके लिए जिम्मेदार है ?
No comments:
Post a Comment